मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

LOKAYAT PRAKASHAN

                                                    भारत में उच्च शिक्षा  की चुनौतिया        
विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थानों के सर्वेक्षण में भारत के विश्वविद्यालय,विश्व के दो सौ विश्वविद्यालयों में से प्रथम बीस की सूची में भी नहीं हैं । क्यों? इस प्रश्न का हमारे पास कोई तार्किक जबाब नहीं हैं। अगर हम इस सवाल के कुछ प्रमुख कारणों को देखें तो स्थिति शायद समझ में आए। अगर हम भारत के चुनिन्दा आई. आई. टी. विश्वविद्यालयों को छोड़ दे जो अपनी योग्यताओं के कारण विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं ,लेकिन सुविधाओं के अभाव में इन संस्थानों के प्रतिभाशाली छात्र अपना देश छोड़ कर विदेशों में नौकरी के लिए जा रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले राज्यसभा मे पूछे गए एक सवाल के जबाब में सरकार के पास वही पुराना जबाब था कि देशभर के केन्द्रीय विश्वविद्यालय अध्यापकों की कमी से जूझ रहें हैं ।आप केवल अंदाजा लगाएँ देश के 39 केंद्रीय विश्वविद्यालयों मे शिक्षकों के चालीस फीसदी पद खाली हैं ,तो वहाँ शैक्षणिक गतिविधियों और उनकी गुणवत्ता की क्या स्थिति होगी। यह केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति है अगर इसमें राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों को भी जोड़ दिया जाए तो तस्वीर बहुत भयावह होगी।
उच्च शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर हमारे देश के राष्ट्रपति और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति प्रणव मुखर्जी भी     चिंतित हैं ,उन्होंने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक बुलाई और अपनी चिंता जाहिर की। वास्तविक स्थिति को जानने के लिए वे खुद केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी गए। वहाँ के शिक्षकों और छात्रों से मिलें,यह एक बढ़िया कदम है । इसी क्रम में राष्ट्रपति जी ने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में कहा कि-हमें एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा जहां युवाओं को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शिक्षा मिले । उन्होंने छात्रों में आत्मचेतना ,संवेदनशीलता ,मौलिक सोच विकसित करने और प्रभावशाली          संवाद ,समस्या समाधान व अंतर्वैयक्तिक संबंध की दक्षता बढ़ाने की जरूरत हैं ।” हमें भी अपनी ज़िम्मेदारी को निभाना होगा तभी उच्च शिक्षा की स्थिति बेहतर हो पाएगी । केवल शिक्षा के बजट को बढ़ाने भर से शिक्षा को बेहतर नहीं बनाया जा सकता ।इसके लिए जरूरी है कि उन बुनियादी कारणों की खोज की जाए और उन कारणों के समाधान का भी सार्थक प्रयास किया जाए । हमें जमीनी स्तर पर उच्च शिक्षा को शीर्ष पर पहुंचाने के लिए ईमानदारी से आगे आना पड़ेगा । विद्यालयी पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से एक छात्र ही कॉलेज पहुँच पाता है । उच्च शिक्षा हेतु पंजीकरण कराने वालों का अनुपात हमारे यहाँ दुनिया में सबसे कम 11 % है, जबकि अमेरिका में यह 83 % है । इस अनुपात को 15 % तक ले जाने के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भारत को 2,26,410 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा, जबकि 11वीं योजना में इसके लिए केवल 77,933 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया      गया था  । उच्च शिक्षा की स्थिति बेहतर बनाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए कई सराहनीय कदम भी उठाए लेकिन दूरदर्शिता के अभाव में स्थिति वैसी की वैसी ही बनी रही । योजनाएँ बनाना और उनका पालन करवाना यू॰जी॰सी॰ और सरकार का काम हैं पर सरकार अपने दायित्व का निर्वाह करने में निरंतर  विफल साबित हुई विसंगति का एक नमूना देखें –तकनीकी पाठ्यक्रम की शुरुवात तो हो गयी लेकिन शिक्षकों की कमी तथा बुनियादी सुविधाओं के घोर अभाव में पाठ्यक्रम भी समय से पूरा नहीं हो पा रहा हैं। इस समस्या से केवल तकनीकी के ही पाठ्यक्रम नहीं बल्कि  मानविकी , विज्ञान के भी पाठ्यक्रम जूझ रहे हैं।
हमें इस तथ्य को भी याद रखना होगा कि विश्वविद्यालय केवल कुछ शैक्षणिक भवनों  का समूह भर नहीं होता हैं, बल्कि वह एक ऐसा केंद्र हैं जहां विचार और चेतना की सीमा को गहन शोध, प्रयोग और विवेचना द्वारा हमेशा विस्तार देने का प्रयास किया जाता हैं। किसी भी शिक्षण संस्थान के मुख्यत: तीन अंग होते हैं- शिक्षक ,शिक्षार्थी और गैर शैक्षणिक कर्मचारी । किसी भी संस्थान की सफलता और विफलता इन्हीं पर निर्भर होती हैं। हमें इन कड़ियों की भूमिका का निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा तभी शिक्षा व्यवस्था मे व्यापक बदलाव आ पाएंगा । सबसे पहले शिक्षको की भूमिका की बात करें,शिक्षक ज्ञान के विकास और प्रसार के माध्यम से समाज को बेहतर बनाने का सामाजिक अभिकर्ता होता हैं । समस्या यह है कि शिक्षक समुदाय अपनी सामूहिक जिम्मेदारी अथवा कर्तव्यपरायणतासे विमुख हो रहे हैं । इसका बड़ा कारण यह है कि अपने निर्धारित पेशे में अपेक्षित दक्षता प्राप्त करने पर भी उन्हें यह विश्वास नहीं रहता कि उनका हक उनकों मिलेगा । आज जिस तरह का माहौल हैं उसमे कोई भी अध्यापक केवल अध्ययन –अध्यापन और अनुसंधान में दक्षता के आधार पर पदोन्नति के प्रति आश्वस्त नहीं रह पाता, और पाया यह जाता है कि नाकाबिल और अयोग्य व्यक्ति केवल जी हुज़ूरी और चाटुकारिता आदि के दम पर पदोन्नति और महत्वपूर्ण पदों को  हासिल कर लेता हैं । इससे उच्च शिक्षा केन्द्रों में निराशा का माहौल उत्पन्न होता हैं । शिक्षण केन्द्रों पर मौजूद जड़ता और रचना विरोधी माहौल भी इस निराशा के लिए उतना ही जिम्मेदार हैं । शिक्षको को केवल ऊँची तनख्वाह पाने वाले अनुपयोगी वर्ग के रूप देखा जाने लगा हैं । हमें इस स्थिति को बदलना  होगा और इस अवांछित जड़ता को तोड़ना होगा तभी हम स्वस्थ शैक्षिक माहौल का निर्माण कर सकेंगे ।
विद्यार्थिर्यों की स्थिति और भी विकट हैं , लोकतान्त्रिक और समतावादी नारों के वावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा दुर्दशाग्रस्त है । सर्व शिक्षा अभियान और मिड-डे-मील की असफलता हम सभी के समक्ष हैं ।  सभी सरकारी और प्राईवेट स्कूल बच्चों के जेहन को कुंद कर रहें है साथ ही उनके भीतर मौजूद प्रश्नाकुलता को भी खत्म कर रहे हैं । इसी अधकचरी मनोदशा को ले कर वह उच्च शिक्षा में जाता हैं जहाँ प्रायः उसे यह भी नहीं मालूम रहता कि वह यह शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहता हैं । हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में वह किसी तरह उत्तीर्ण हो जाता हैं । कुछ छात्र समुचित तैयारी के साथ आते हैं पर इस निराशा भरे परिवेश मे दम तोड़ देते हैं। यह निराशावादी माहौल उच्च शिक्षा केन्द्रों को विश्वस्तरीय स्थान दिलाने मे असफल हो रहा हैं और उच्च शिक्षा केवल अर्द्धशिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही हैं ।
इन सब के अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है विश्वविद्यालय का व्यवस्था तंत्र जो शिक्षको और विद्यार्थियों के बीच की कड़ी हैं । इन्हें गैर शिक्षक कर्मचारी कहा जाता हैं ,ये एक तरह के नकारात्मकता के शिकार होते हैं जो इनकी कुंठा से जुड़ा हुआ हैं । गैर शैक्षणिक वर्ग के भीतर यह सोच काम करता हैं कि ये कही न कही से हीन हैं इसलिये इनका रवैया शिक्षण और शिक्षक विरोधी हो जाता हैं । शिक्षा केन्द्रों को शिथिल करने में इनकी प्रमुख भूमिका होती हैं । ऐसे माहौल मे हम मौलिक चिंतन और शोध की संभावना कैसे कर सकते हैं । ये शिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण कड़ी हैं इसलिये इन्हें भी सकारात्मक भूमिका निभानी होगी ।
देश की शिक्षा व्यवस्था में और शिक्षा के प्रति दृष्टि में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्कता है, ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकारें और शिक्षा-विशेषज्ञ अपेक्षित शैक्षणिक सुधारों की दिशा में ठोस कदम उठायेंगे । हमें मौजूदा शिक्षा प्रणाली को बदलना होंगा और रोजगारपरक शिक्षा और तकनीकी शिक्षा पर विशेष ध्यान देना  होंगा  । नैसकॉम और मैकिन्से के ताज़ा शोध के मुताबिक मानविकी में 10 में एक और अभियंत्रण में डिग्री प्राप्त 4 में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं । राष्ट्रीय मूल्यांकन व प्रत्यायन परिषद् (नैक) का शोध बताता है कि इस देश के 90 फ़ीसदी कॉलेजों एवं 70 % विश्वविद्यालयों का स्तर बेहद कमज़ोर है । आज़ादी के पहले 50 सालों में 44 निजी संस्थानों को डीम्ड वि.वि. का दर्जा मिला । पिछले 16 वर्षों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गयी । शिक्षा के वैश्वीकरण के इस दौर में महँगे कोचिंग संस्थान, किताबों की बढ़ती कीमत, डीम्ड वि.वि. और छात्रों में सिर्फ सरकारी नौकरी पाने की एक आम अवधारणा का पनपना आज की तारीख की अहम उच्च शैक्षिक चुनौतियाँ हैं ।अकबर इलाहाबादी ने इसी स्थिति को देखते हुए बहुत सटीक बात कही हैं -
                 
न पढ़ते तो खाते सौ तरह कमा कर / मारे गये हाय तालीम पाकर
                 न खेतों में रेहट चलाने के काबिल / न बाज़ार में माल ढोने के काबिल



डॉ॰ कमल कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी )
उमेशचन्द्र कॉलेज
13,सूर्य सेन स्ट्रीट ,कोलकाता-12  
mob. 09883778805 /09450181718

e.mail-kamal3684@gmail.com

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